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ये दिल....दिल कहाँ सुनता है , किसी की ।

ऐ दिल....दिल कहाँ सुनता है , किसी की ।

यह तो इश्क करता है , दर्द पाने के लिए ।

देखा....देखा दिल ने ही , किया मज़बूर मुझे । 

तेरे शहर आने के लिए ।

बहाना भी मिला खूब आने का , वरना कहाँ हम आ पाते ।

शायद वक्त ने ही , दिया हो मौका ।

 राह ए मोहब्बत की , हिचक मिटाने के लिए ।

अब भय नही बस , यूँ ही संभल कर रहना है हमें ।

मोहब्बत का दीया अपना  , यूँ  ही जलाने के लिए  ।

बहुत अरमान था मेरा के , मिलूं मैं उनको  ।

रहे फासले जिस वजह से , दरमियाँ हमारे ।

लो आज दिल का वो , अरमान भी पूरा हुआ ।

हमारे दिल के और , करीब आने के लिए  ।

ये दिल....दिल कहाँ सुनता है , किसी की ।

अब तुम सज़ा दो , यार ! यह सराहाओ हमें ।

ये अब हमने तुम , पर छोड़ा है ।

हम हर हाल में है तैयार , तेरा हर करम पाने के लिए ।

रूठना न कभी हमसे बस , यह इल्तज़ा है मेरी ।

तेरा साथ यूँ ही बना रहे , दूर दूर ही सही ।

इतना ही काफी है ऐ मोहब्बत ! मेरे जीने के लिए  ।

खुश हूँ मैं बहुत तेरी कसम , ऐ दिल ! 

के कुछ बंदिशें तो हुई खत्म , हमारी मुलाकातों के लिए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।



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