#मुफ्तखोर_जनता_के_विचार
मुफ्त की सहूलियत पाना भी , कहाँ आसान है जालिम !
बेचना पड़ता है ज़मीर अपना , जालसाज़ी के बाज़ारों में ।
ख़ाक हो जाए चाहे चमन , लूट ले जाए वतन कोई ।
हमें क्या , हमें तो बस मिलता रहे ।
मुफ्त !
भाड़ में जाए देश समाज , हमें इस्से क्या ?
जो दे हमें मुफ्त सब कुछ , हमारा तो राजा वोई ।
नही भाती फूटी आंख भी हमको ,
वो मन की बात , है जो करता ।
न खाता खुद ही ,और ना हमें ही खाने देता ।
@रतूड़ी
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