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हर किसी के , नशीब में कहाँ ।

हर किसी के , नशीब में कहाँ ।

आँख खुलते ही , किसी की याद आइए ।

यह प्यार है , किसी की याद आना ।

और यह , परिभाषित हो जाये ।

हर किसी के , नसीब में कहां इंतज़ार ।

किसी की आवज आने की , 

वीराने का , मुसाफिर है जो ।

यह प्यार है इंतज़ार किसी की , 

आवाज का आना ।

और यह परिभाषित हो जाये ।

हर किसी के नशीब में कहाँ , 

जिससे झगड़ा किया और , 

मनाने आने का इंतज़ार  हो ।

यह प्यार है किसी के , मानने का आना ।

और यह परिभाषित हो जाये ।

नहीं जी ! सब मुकद्दर का , खेल है ।

न निभी तो तमाशा , निभी तो ।

सुंदर , हसीन मेल है ।

आभासित हूँ , गुजर रही है खुद पर ।

फिर कैसे मैं मान लूँ , प्यार ! यह है ।

विरिक्त हूँ , दिल पत्थर होना बाकी है ।

देखता हूँ , कब तलक ।

पिघलता है , दिल मोम की तरह ।

बस इक दोस्त की , इनायत है मुझ पर जो ।

अभी तक , थोड़ा खुश हूँ ।

जिस दिन , वो भी छोड़ कर जाएगा ।

उस दिन शायद दिल मेरा , पत्थर का हो जाएगा ।


✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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