एक अजीब सी कशिश है , तेरे इस गुलबदन में ।
जो मैं खिंचा सा , चला आता हूँ ।
वरना कहाँ कमी है , इस गुलसितां में हुस्न वालों की ।
हर दिल की धड़कन , बनने का हुनर बखूबी हम जानते है ।
हर कली को चमन में , खिलाना भी हम जानते है ।
मगर अजीब सी मदहोशी है , तेरे बदन की खुशबू में ।
जो मैं मदहोश , हुआ जाता हूँ ।
वरना कहाँ कमी है ,इस शहर में मयखानों की ।
पी तो लें हम शराब , हर मयखानों से मगर ।
हमें जचती नही शराब , किसी भी मयखानों की ।
हमें तो भाती है शराब , सिर्फ तेरी शरबती आँखों की ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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