सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हमारा भी उद्धार हो जाए !!!😂😂

हमारा भी उद्धार हो जाए !!!😂😂 देखना कहीं गुड़ की डली कोई ,इधर उधर सरक कर , लुढ़क कर , कहीं मिल जाए ।

चख ले स्वाद हम भी , कैसा होता है , मिर्च लगने के बाद ।

चलो छोड़ो रहने दो अब तो , आदत हो गयी है मिर्चि के खाने की ।

 बस पानी से थोड़ा , तीखापन कम कर लेता हूँ ।

अब तो रह भी नही जाता , मर्चि के बिना ।

यदि न दिखे तो उसे , ढूंढने लग जाता हूँ ।

वो भी कम नही , बड़ी मासूमियत सी , भोली सी दिखती है ।

रोज नही बस अब तो , कभी कभी ही तीखी लगती है।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

सांकेतिक अर्थ :-  गुड़ की डली ≠ बाहर वाली 
मिर्च / मिर्ची = घर वाली 
पानी = चुप रहना / शीतल रहना ।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो कोई अब नहीं पूछता हाल ए दिल..

वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।

थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से । थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले । रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक । सफर लम्बा रहा है , अब तलक । न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक । आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो ! प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है । ढल गया हूं जिस्म से , देख तो । मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है? ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"

हाँ माँ सच तुम होती जो संग हमारे ।

 हाँ माँ मैने खाया आम कच्चा , मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । एक आने के लिए फाल्से, दिए बाबा ने केवल चार । तुम भी होती संग नानी के , खाती तुम भी आम का अचार । नाना ने गाड़ी में बिठाया , मेला सारा हमें घुमाया । इक अन्नी का बजा मुझे , मुन्ना को गुब्बारा दिलवाया । नाना ने फिर टपरी में जाकर , चाय पकौड़ी और नमकीन खिलवाया । हाँ माँ ! सच तुम होती जो संग हमारे , चरखी , झूला , नाच कठपुतली का देख कर संग में बजाते ताली । शोर-शराबा कहीं हाथी भालू , नाच रही थी बंदरिया मतवाली । हाँ माँ मैंने खाया आम कच्चा ,मैं हूं तेरा लाडला बच्चा । ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी