मिले उन्हें तुम , जिनके मुकद्दर में था प्यार तेरा ।
हम यूँ ही भटकते रहे , इन रहगुज़ारों में दीवानों की तरह ।
मिले उन्हें तुम....
न पा सके तुमको , न किसी की मंज़िल ही हम बन सके ।
रहा दर्द ही दिल में , न तुम हमको मिल सके ।
न किसी को दर्द ही हम , अपना बतला सके ।
मिले उन्हें तुम....
रहा नशीब ही गैरों की , इनायत में रहूँ ।
किसी गैर को कभी हम , अपना बना न सके ।
गैर तो गैर है इतना , करम काफी है ।
अपनों की वफ़ा का सिला भी हम , कभी पा न सके ।
मिले उन्हें तुम.....
अब तो ख्वाइश ही न रही कोई और , सिवा ऐ जान ए वफ़ा ।
के देखूँ इक झलक ही सही , तेरे आफताब रुख़्सरों की ।
नैनों में समेटे हुए , अश्क जज़्बात दिल के ।
खिदमत में मैं , तुझे पेश करूँ ।
न रहे एहसास मेरे दिल मे फिर कोई , न गम किसी बात का रहे ।
हो जाऊं रुख़सत फिर में इस जहां से , न मलाल फिर मुझे किसी बात का रहे ।
मिले उन्हें तुम......
✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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