आने लगी है अब , होले होले से ।
अँखियों के पट , ढलने लगे है ।
सुस्त सी अंगड़ाईयाँ लेकर ,
झरोखों से , अँखियाँ झाँक रही है ।
कभी नशीली सी , हो जाती है ।
कभी लड़खड़ाने लग जाती है ।
देखो अब न दस्तक देना कोई ,
न खटखटाना पट , इन अँखियों के ।
इनकी अब स्वप्न लोक में ,
जाने की तैयारी है ।
शायद मिल जाऊं मैं उन्हें ,
जिनसे न रूबरू , हो सका मैं आज तलक ।
हुस्न शायद होगा , इंताजर में क्या पता ।
मुझे अब अपने ,
दिल-ए-ख्वाइस से मिल जाने दो ।
आ गयी है अब मेरी अँखियों में ,
नींद बेसुध , अब मुझे ,
मधुर स्वप्नों में खो जाने दो ।
*शुभ रात्रि*
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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