आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है ।
ये दिल ओ दिमाग की , कैसी कशमकश है ।
ये कैसी उलझन है , जो नींद मेरी उड़ा ले जाती है ।
सोने की कोशिश में लगा हूँ , जब भी आंखें बंद करता हूँ ।
न जाने कौन सी छवि , अनजानी सी उभर आती है ।
आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है ।
आज रात मुझे , नींद क्यों नही आती है ।
फिक्र हो शायद कोई , हाँ फिक्र ही होगी ।
पर यह कैसी फिक्र है ?
है तो मुझे , समझ में क्यों नही आती है ।
न जाने कौन सी छवि , अनजानी सी उभर आती है ।
न जाने क्यों ?
आज रात मुझे , नींद क्यों नही आती है ।
रात्रि का अंतिम पहर हो चला है , आंखे सुर्ख हुए जाती है ।
दिमाग मे चलचित्र सा , न जाने क्या चल रहा है ।
ये धुंधला सा , ये क्यों है ?
मुझे तस्वीर कोई ,
साफ क्यों नही , नज़र आती है ।
आज रात मुझे , नींद क्यों नही आती है ।
आज रात मुझे , ये बेचैनी क्यों हुई जाती है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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