हो कोई और करीब मेरे दिल के , यह मुझे मंज़ूर नही ।
मुझे मेरे दिल से , दूर रहने की अब आदत नही ।
बहुत मेहनत से सजाया है मैंने , इसे नाज़ुक हालातों में सवाँरा है मैंने , इसे ।
कोई और हो करीब इसके , यह मुझे मंज़ूर नही ।
मगर ये दिल है मेरा के , मेरी मानता ही नही ।
चला जाता है अब ये मुझे छोड़ कर , हुस्न की वादियों में ।
मैं अकेला ही रह जाता हूँ तन्हा , इसके लौट आने के इंतज़ार में ।
इक गुल है जो , बहुत भाता है इसे ।
जिसे यह दिल मेरा , कभी भूल पता नही ।
मिलना कहाँ मुमकिन इसे , वो गुल ।
पहरे बहुत है जमाने के ।
समझाऊं कैसे इसे , समझता ही नही ।
लाख कहा है इसे , मैंने ।
आ लौट आ मेरे सिवा , तेरा और कोई नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूडी
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