समझ सको तो बेहतर है , खामोशी भी ।
बिन कहे दिल के , हर जज्बात बयाँ हो जाते हैं ।
न डर है यह कि , कोई सुन लेगा ।
न डर है यह कि कोई , क्या कहेगा ।
आंखें ही जुबाँ और , कान बन जाते है ।
खामोशी गहना है गम का , और खुशी का सृंगार भी ।
खामोशी ही है सिफा जिन्दगी का , और अभिशाप भी ।
वक्त वक्त की बात है , किसको क्या दे जाए ।
या क्या बना जाए , ये खामोशी ।
यह सब , मुकद्दर की बात है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें