तेरे इतने से ही करम का , शुक्र गुजार है हम बहुत ऐ जिन्दगी !
तू चली तो सही ,
वरना जमाने ने , कसर न छोड़ी थी मुझे गिराने में ।
बढ़ती रही तू कदम दर कदम , कभी लखड़ाते हुए ।
तो कभी गिरते , और संभलते हुए ।
अच्छा ही हुआ ठोकरें जो लगी ,
हर ठोकरों का सिला भी , ये खूब मिला ।
के अनजानी राहों से भी मेरी , अब पहचान हो गयी ।
अजनबियों से भी रिश्ता जुड़ा , इन राहों में ।
हर कोई रहा मुझसे परे , संग था तो सिर्फ मेरा साया ।
अब हर चेहरे की मुझे , पहचान हो गयी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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