खुशी ऐसी भी क्या जो , छलक जाए शराब के प्यालों में ।
गम ऐसा भी क्या जो ले जाए , कदम मयखानों में ।
समझौता वक़्त से , करना सीख ले ऐ दोस्त !
दौर खत्म नही हुआ अभी ।
अभी तो और भी दौर आएंगे , जिंदगी के बाज़ारों में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
रविवार 24 जून 2007
खुशी ऐसी भी क्या जो , छलक जाए शराब के प्यालों में ।
गम ऐसा भी क्या जो ले जाए , कदम मयखानों में ।
समझौता वक़्त से , करना सीख ले ऐ दोस्त !
दौर खत्म नही हुआ अभी ।
अभी तो और भी दौर आएंगे , जिंदगी के बाज़ारों में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
रविवार 24 जून 2007
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