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अपना खून हो या , हो बंधन फेरों का ।

अपना खून हो या , हो बंधन फेरों का ।

न हो एहसास अगर किसी को , किसी के ज़ज़्बातों का ।

तो मोहब्बत , कैसे  मिले ।

हर कोई नही कर पाता , दिल पर पत्थर रख कर सहे बेरुखी अपनों की ।

 लाख कोशिशें हो जाए जब , मनाने की सिफर । 

फिर सकून की तलाश में ,भटकता है वो दर-ब-दर ।

हिम्मत जुटानी पड़ती है बहुत ,अपनों के जुल्म ओ सितम सहने की ।

मगर आज के जमाने में वो अब ,  हिम्मत है कहाँ ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूडी

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