नब्जों में जम जाए , लहू जब ।
रफ्तार आहिस्ता आहिस्ता हो जब
दिल की धड़कनों की ।
टूटने लगे सांसे , और जुबाँ खामोश हो जब ।
आंखों में किसी अपने का , इंतज़ार लिए ।
डगमगाए जब , इधर उधर अश्क लिए कुछ पल ।
अश्क बन जाए , दिल ए जज़्बात
जो न हो सके बयाँ लबों से जब ।
समझ जाए जो कोई उस पल , वो जज़्बात ।
वो सवालात , उन बेबस आंखों का ।
वही रहा हमराज़ सच्चा दोस्त , जिंदगी का ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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