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न वो पहली सी उमंग है कोई , न तरंग ही रही कोई ।

 न वो पहली सी उमंग है कोई , न तरंग ही रही कोई ।

चली जा रही है अब जिंदगी , कटी पतंग सी कोई ।

थी मोहब्बत जो कभी , दरमियाँ हमारे बेइंतहा ।

 रह गयी है आज , वो मोहब्बत । 

समझौतों की , तहरीर बनकर ।

गुजरता हूँ अब कभी , जब मैं दिल की उन राहों पर ।

 जहाँ मोहब्बत के गीत , गुनगुनाया करते थे हम कभी ।

आज सुनी सुनी सी लगती है , वो राहें दिल की ।

मानो वर्षो हुए उन राहों से , अब तक कोई गुजरा नही ।

है मौजूद वो निशाँ अब भी , हमारी मोहब्बत के ।

जो रह गयी है दिल में अब , एक अमिट याद बनकर ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 


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