और क्या , कैसे गद्दार होते है ?
अपने घर को तोड़कर ,
समान उसका , दूसरों की इमारत पर जोड़ देते है ।
अपना दमन कर के दुमिल , दुश्मनों के तलवे चाट लेते है ।
अपना हो राज पाट ,
मूर्ख राज हो , प्रजा भी मूर्ख ही बनी रहे ।
आये दुश्मन चढ़े सर माथे पर , झुक झुक कर उनको नमन हो ।
और क्या , कैसे गद्दार होते है ।
समझ में ना आये ,क्यों इनको खुला छोड़ देते है ।
हो नाश इन रक्तबीजों का , ले रक्त इन का ऐसा कोई दिल वाला हो ।
हो कोई जो पी सके लहू इनका , पनप न सके फिर धारा पर ये रक्तबीज ।
ऐसा कोई , खप्पर वाला हो ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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