दिल का दर्द मैं छुपा लेता हूँ , अपनी मुस्कुराहटों से ।
दो घूंट पी लेता हूँ अश्क , और जी लेता हूँ ।
गुनगुना लेता हूँ गीत कोई के , थोड़ा तो सकून मिले ।
इसलिए कभी कभी अपने दिल से , दागा कर लेता हूँ ।
लो आज तो बहारों ने भी साथ दे दिया है , मेरी तन्हाइयों का ।
मैं यूँ गुनगुनाया ही था के , साज़ वो खोए हुए थे जो कभी वो फिर से बजाने लगे ।
कुछ घड़ी ही सही कुछ पल ही , मुझे मेरे दिन वो बचपन के याद आने लगे ।
चल सफर में चल तू यूँ ही , ऐ अक्स मेरे ।
ख्वाबों ख्याल में बनकर वो मेरे उम्र भर , मेरी तन्हाइयों से लिपटी रहे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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