मैं तो झाड़ हूँ तेरे उपवन में , मुझे क्यों अभिमान हुआ ।
आज देखा , सोच , समझा , अभिमान मेरा चूर हुआ ।
देखा मैंने वृक्ष सघन ,डाली कोपल फूल फल ।
और चहक रहे थे खग ,कूक रही थी मतवाली कोयल ।
मैं काग ना जाने सुर न ताल न छंद , बना मैं कवि सौदों , भ्रम जाल में मैं पड़ा रहा ।
बनी माला रस राग भाँति भाँति के , पुष्प कंठी में पिरोए हुए है ।
मस्त झूमती लता बेल , और भवरों की गुंजन ।
ठाठ बाट नृत्य तितलियों के देख , झूम उठता मन ।
मैं तो झाड़ हूँ तेरे उपवन में , मुझे क्यों अभिमान हुआ ।
आज देखा , सोच , समझा , अभिमान मेरा चूर हुआ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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