जिये भी क्या इस तरह से के , खाक उम्र कर दी ।
ढूंढते क्या मिलेगी अब , शोले बुझती राख में ।
चिरागों में कब तलक तो , रहेगी रोशनियाँ ।
सुबह के होते ही अक्सर , चिराग भी बुझा दिए जाते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
जिये भी क्या इस तरह से के , खाक उम्र कर दी ।
ढूंढते क्या मिलेगी अब , शोले बुझती राख में ।
चिरागों में कब तलक तो , रहेगी रोशनियाँ ।
सुबह के होते ही अक्सर , चिराग भी बुझा दिए जाते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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