तुम आये तो मेरे , उदास मन में ।
आभा एक प्रेम की , चमक उठी ।
हो गए दर्श मुझे , मुख मंडल के तेरे ।
अंधेरा था मगर , मन की आंखों से
मैंने तुम्हें देख लिया ।
मन पपीहा मोरा , नीर तुम ।
रहूँ दूर गगन में तुझे पाने की , आशा लिए ।
न जाने कब...कब समय सावन आये ।
न जाने कब.....कब तुम नीर बन कर ,
मेरे मन पपीहे पर बरसे ।
तेरी झलक ही , आसरा है मेरे जीने का ।
तेरा छुआ ही दवा है मेरे , दर्द ए सीने का ।
ले ले अपनी आगोश में मुझे , तू जो इक बार ज़रा ।
आएगा मज़ा फिर , शान से जीने का ।❤️
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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