अब बरसात का इंतज़ार है , मेरी इन डब डबी सी आंखों को ।
वो कह कर तो कुछ , यूँ ही तो गया था ।
के फिर बरसात में मिलेंगे ।
मेरे मन के चकोर की , चाहत कुछ यूँ न हो जाए के ।
तू चाँद सा हो जाए , दूर गगन में कहीं ।
मेरे नैनों के झरोखों से न झरे , शबनम की बूंदें कोई के तेरे विरह में ।
आ जाओ के कहीं सारंगा बनकर , तुझ बिन मर न जाऊं मैं ।
फिर फसाना बन कर , रहेगा हमारे इश्क का ।
लोगों की जुबाँ पर , क्या फायदा ।
कहीं बेवजह , रुसवा न हो जाऊं मैं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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