आज मच्छरों की बारात में , न चाहते हुए मैं भी शामिल हो गया ।
खूब बजे बैंड बाजे डीजे , बेस बारीक था मगर ।
बड़े आनंदित थे वो सारे और मैं , दावत में उनके आगे रात भर परोसा गया ।
कभी पाऊँ कभी गाल मेरे , चूमते वो मेरे अंग प्रतिअंग ।
मैं खामोश सा कभी तड़पता भटकता कराहता ।
अपनी विवशता पर , आँसू बहता ।
उफ्फ कब कटेगी यह रात , शमशान की सी शैय्या में लेटा हूँ ।
काश कोई , चमत्कार हो जाये ।
न एहसास हो मुझे उनके दंश का , और मुझे नींद आ जाये ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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