मुकद्दर का ही है , सब कुछ ऐ दोस्त !
प्यार मोहब्बत इश्क ,
खेल हो या मेल झूठ हो या हकीकत ।
गम जुदाई बेवफाई किसी की ,
या हो रुसवाई जमाने की ।
लिखी है जो नशीब में , मिटे न मिटाये ।
तन्हा हो सफर या , हो सफर में हमसफ़र साथ ।
कुछ दूर तक ही चलना है , हर किसी को मेंरे यार ।
आये हैं अकेले इस जहां में , जाना भी अकेले है ।
जियो मस्त रहकर , क्यों मन को करें हम उदास ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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