शुक्र है के आपकी रात ,
दो करवटों पर ही सही ।
कम से कम , सो तो जाती है ।
यहाँ तो करवटें ,
बदल बदल कर हमारी ।
सारी सारी रात ,
गुजर जाया करती है ।
खामोश रात और ,
उसमें इंतज़ार उनका ।
बेचैन मेरे दिल को ,
किये जाती है ।
नींद भी खो चुकी है ,
अब आंखों से ।
अश्क भी सूख गए है ,
अब इन नैनों से ।
है यकीन के ,
वो नही है अब ।
मेरे इस दिल की ,
महफ़िल में ।
फिर ना जाने क्यों ,
मन की वादियों में ।
उनकी सदायें ,
अब सुनाई देती है ।
शुक्र है के आपकी रात ,
दो करवटों पर ही सही ।
कम से कम , सो तो जाती है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें