दूर जहां तक निगाहें , जा सके देख लूँ ।
आज हूँ यहां कल , शायद ना रहूँ ।
ये वादियाँ ये मस्त नदी का किनारा ।
ये मदमाती मस्त हवाएँ ।
भवरों के गुंजन , ये फूलों का हंसना ।
बलखाती लताओं का , आपस में मिलना बिछुड़ना ।
ठहरूं कुछ देर और , कुछ देर और देखूँ ।
अम्बर पर छाए , घनघोर घटाएँ ।
ऐसे में मोहे , पीया याद आये ।
बरसे हैं शायद अब , कारी बदरिया ।
पीया बिन मोहे अब , कुछु न भाये ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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