बर्षो बीत गए हैं इक याद , अभी भी ताज़ा है इस दिल में ।
जब तुम शरमाई सी छुईमुई सी , सिमिटी हुई समाई थी मेरे आलिंगन में ।
तेरे तन की सुगन्धा ने , सम्मोहित किया था मेरा मन ।
तेरे हृदय के पाश में , बंध गया था मैं जीवन भर ।
वही प्रेम की अनुभूति लिये , अब तक जी रहा हूँ मैं ।
अपने वर्तमान और भाविष्य को , भूत की चादर से ढांक रहा हूँ मैं ।
वही प्रेम की अनुभूति लिये , अब तक जी रहा हूँ मैं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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