भगवान करे यह उलझन हमारी ,
यूँ ही सदा चलती रहे ।
लड़ते झगड़े रहें बेशक मगर ,
इश्क हमारा यूँ ही , सदा चलता रहे ।
प्रेम ही हो दिलों में , इक दूजे के लिए ।
नफरत का न कभी , बीज जमें ।
एहसास अपनेपन का , दिलों में हमारे ।
यूँ ही , सदा पनपता रहे ।
तन से दूरी भले रहे मगर ,
मन से दूरी कभी न रहे ।
भगवान करे यह उलझन हमारी ,
यूँ ही सदा चलती रहे ।
सुलझ गए जिस दिन ,ये उलझन ।
उस दिन फिर तुम कहाँ , और हम कहाँ ।
होंगे सब अपनी डगर पर ,
तन्हां कोई यहाँ तो कोई वहाँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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