कब तक रहूंगी मैं माँ , दुपकी हुई सहमी सी इस घरोंदे में ।
क्या मैं भी उड़ पाऊंगी कभी , अपनी उड़ान तेरी ही तरह ।
बतला कब तक रहूंगी मैं यूँ डरी सहमी सी ।
मुझे भी उड़ना है , दूर गगन में तारों संग बतियाना है ।
चंद्र की चंद्रिका में , जी भरके मुझे भी नहाना है ।
दिनकर की तपिस में , हरी डाल की छांव तले ।
मुझे भी थोड़ा , सुस्ताना है ।
हरे भरे बाग बगीचों में , मुझे भी सैर को जाना है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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