अंधेरे से गुजरे जब तो , सलामत थे हम ।
उजाला आते ही ठोकर लगी और , गिर पड़े हम ।
जानते हो क्यों ऐसा हुआ ?
अंधेरे में हम खुद संभल कर चल रहे थे ।
तन ,मन और बुद्धि को , हम एक किये थे ।
उजाला ज्यों ही दिखा , हम बेफिक्र हुए ।
मुस्कुराए झूमे , खिलखिलाए नाचे कूदे हम ।
व्यस्तता इतनी रही खुशी के संग ,
के ध्यान ही न रहा हमें रास्तों का ।
हुए लापरवाह ज्यों ही लगी ठोकर , और गिर पड़े हम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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