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हर बार कोई आ के , तेरा ज़िक्र छेड़ कर

 👧“हर बार कोई आ के , तेरा ज़िक्र छेड़ कर ।

इक आग फेंक जाता है , मुझ सूखी कपास पर ।”


👦वो तो शुक्र है इन बादलों का , 

जो बरस रहे मुझ पर होले होले ।

वरना हम जल कर , खाक हो जाते । 

👧😱😱😱कोन है वो कम्वकत ?

👦राज़ की बात है , 

राज़ ही रहने दो ।

खुल जाए गर राज़ तो , 

मुश्किल होगी ।

तुम भी चैन न पाओगी फिर , 

हमसे दूर रहकर ।

पास आने की भी , 

तुझ में हिम्मत न होगी ।

घुटती ही रहोगी , खुद में खुद ही ।

मुझसे मिलने की जुस्तजू लिए ।

पा न सकोगे तुम मुझे कभी अब ,

इक मुलाकात के लिए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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