▪️“जो हो कर भी न हो...उसका होना कैसा,
▪️सिर्फ नाम के रिश्ते से शिकवा कैसा...रोना कैसा।”(एकु)
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◼️इत्तेफाक ही है ये कि , यह मेरे एहसासों में भी सामिल है ।
मंज़िल अलग अलग है मगर , राहें उलफत में हम ।
सताए हुए , एक से है ।
◼️ये तो तय है कि तुम , अकेले ही नही हो तन्हां इस जहां में ।
इतेफाक ही सही मगर , तेरी तन्हां रातों संग ।
मेरी रातें भी , सामिल है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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