हमारी हंसी को न जाने , किस की नज़र लगी है यारों ।
बर्षो बीते भूल चुका हूँ , मैं अब मुस्कुराना ।
याद आया आज फिर वो , आखरी हमारा खिलखिलाना ।
हँसते हँसते अँसुवन का , आ जाना ।
वो साथ बैठ कर , इक दूजे को थपथपाना ।
याद आया आज फिर वो , आखरी हमारा खिलखिलाना ।
तुम भी सोचते होंगे यारों के मैं दर्द ही , क्यों बयाँ करता हूँ ।
मगर इस दर्द की बदौलत ही तो , हुआ है मेरा अंदाज़ शायराना ।
बर्षो बीते भूल चुका हूँ , मैं अब मुस्कुराना ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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