आया याद वो तेरा दिया हुआ , आठ अन्ना माँ !
जिद्द थी मेरी देखूँ मैं भी , जाऊँ संग बहनों के मैं मेला माँ !
किया था इनकार जब तूने , पुचकारा सीने से लगाया था तूने माँ !
तूने खोली गांठ पल्लू की , मेरी जिद्द के आगे हारी थी तू माँ !
दी थी आज्ञा जाने की मेला , बहुत हर्षित हुआ था में माँ !
नाचा झूमा भाई बहनों संग मेले घूमने गया था मैं माँ !
पंजी का गुब्बारा जल का , और पंजी का लिया था बाजा !
चूड़ी बिंदियां जलेबी पकोड़ी सब तो , चालीस का लिया था माँ !
बहुत सुख के दिन थे वो , सस्ता था वो बचपन का जमाना माँ !
आया याद वो तेरा दिया हुआ , आठ अन्ना माँ !
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
अद्भुत रचना,
जवाब देंहटाएंमाँ और बचपन दोनो की याद दिलाता, रूलाता,
यादगार संस्मरणीय रचना आदरणीय 👌👌🌹🌹👏👏
आभार जी !
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