हम तो घुट घुट कर जियेंगे अब , बन्द कमरे में ।
दिल की उमंग दफन होती रहेगी , दिल के किसी कौन में ।
खुली हवाओ में गर कभी , निकलेंगे बाहर कहीं ।
हो जो , इनायत किसी की ।
डर रुसवाई का कभी , इश्क करने कहाँ देगा हमें कहीं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
हम तो घुट घुट कर जियेंगे अब , बन्द कमरे में ।
दिल की उमंग दफन होती रहेगी , दिल के किसी कौन में ।
खुली हवाओ में गर कभी , निकलेंगे बाहर कहीं ।
हो जो , इनायत किसी की ।
डर रुसवाई का कभी , इश्क करने कहाँ देगा हमें कहीं ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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