बैठा ध्यान से एकान्त में मैं , जीवन को जब खुद में तलास किया ।
तो पाया है कुछ ऐसा के , जो टिका था हाथों में ।
उस क्षण ठोकर से गिरा वो , अनंत की ओर ।
जर्जर हुई काया धरि की धरि, रही माया ।
स्वाद ही इक करम का , रहा है साथ यादों में ।
आखरी दम से कुछ क्षण पहले , होश रहने तलक ।
फिर कौन खड़ा कौन नही , दाएं बाये अगल बगल ।
बस ज़ुबाँ पर रहूंगा में किसी के ,सिर्फ कुछ लम्हों तलक ।
यही भागमभाग ही जीवन रहा , शायद यही जीवन का निष्कर्ष ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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