कर ले खुद को मज़बूत ऐ दिल के ,
वो साथी चलते सफर का था ।
ऐ दिल चंद मुलाकात उनसे , तेरी क्या हुई ।
तू तो यूँ ही उन्हें अपना हमसफ़र , समझ बैठा ।
वो वक्त गुजारते रहे ,
तुम खुद को , उनके लिए हारते रहे ।
तुम तो डूबे रहे , जज्बातों के गहरे समंदर में ।
तुम्हें मालूम ही न हुआ , कब मुकाम आया उनका ।
और ! कब वो सफर में तुम्हें , अकेले छोड़ गए ।
अब न करना यकीं दिल ,
किसी और पर आगे के सफर में ।
चलना साथ मगर , रहना एहसासों में अकेले ।
बड़े बे रहम है लोग यहां , दिल बहलाकर अपना ।
सफर में अकेला , छोड़ चले जाते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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