न जाने वो शाम कब आएगी ।
कहा था कभी तुमने के मैं , शाम को फोन करूंगी ।
तब से हर शाम ,मोबाइल को सज़ा धज़ा कर ।
बैटरी फूल , चार्ज करवा कर ।
इयरफोन को , मोबाइल में कनेक्ट कर मैं ।
कानों में चिपका कर हर शाम ।
बस तेरा ही फोन का इंतज़ार , किया करता हूँ ।
न जाने वो शाम कब आये , आये भी या न आये ।
बस यही अंजमस में ही , पड़ा रहता हूँ ।
☹️☹️☹️
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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