दिल को झंझोड़कर ,
रख देगा यह दृश्य ।
मानवता कह लो ,
या इंसानियत ।
अब तो सब ,
लापता ही हो गयें है ।
मैं इससे आगे क्या कहूँ ,
रोना चाहूँ तो रो भी लूँ मगर ।
पागल ही समझा जाऊंगा मैं ,
क्योकि अश्क तो अब ।
आंखों से ही लापता हो गयें है ।
ना कंधा मिला एक भी , न स्पर्श ।
और कर दुराश से दफन , बे कफन ही
ले गए हैं ।
आज मानव मानवता से ही ,
बिमुख हो गए है ।
धर्म का अंतिम संस्कार अब ,
हर कोई कर गए है
ना मिले कांधे चार न किसी का स्पर्श ,
ले गए बिना कफन ।
हाय रे तेरी इंसानियत , हाय रे तेरा धर्म ।
कर गए मुझे क्यूँ यूँ , बेअदबी से दफन ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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