बचपन लौट आया है शायद आज ।
हाँ हाँ कुछ ऐसा ही , एहसास हुआ है मुझे ।
कुछ कुछ धुमला सा ,
वो दिन बचपन का , मुझे याद आया है आज ।
बहुत सुंदर था तब ,
खेल भी और मेल भी , दिलों से खेले जाते थे ।
दिल से दिलों को , जीते जाते थे ।
कुट्टी कुट्टी अंगूठे को , दांतों से छटक कर कहना ।
पल भर में रूठकर , कुछ दूर जाना ।
उसी पल अंगूठे को , मुख में गोल गोल घूमकर ।
अब्बा-अब्बा कहकर ,पास आना ।
उसे मनाना उसका मान जाना ,
उसी पल रोना , उसी पल हँसना ।
हँसते हँसते एक दूजे से , लिपट जाना ।
सब याद आया है आज , वो बचपन का जमाना ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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