वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
मुद्दतों से , हाँ मुद्दतों से ।
आज , मुस्कुराया हूँ यार ।
सच ! दिल से , हाँ दिल से ।
खुलकर हँसा हूँ मैं आज ,
कई सालों के बाद ।
रहना यूँ ही सदा तुम ,
अब मेरे इर्द गिर्द ।
दिल ए ज़ख्म , हो चले अब ।
"बे दर्द"
कई मुद्दतों के बाद ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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