मुझे दर्द से है इश्क भला , मैं क्यों दर्द को यूँ बदनाम करूँ ।
महबूब बनके गम मेरा , रहे साथ मेरे जख्म हरा हरा ।
मुझे दर्द से है इश्क भला....
रहे उम्र भर वो खफा खफा , मेरे दर्द की वही इक दावा ।
आये न चैन तो क्या , बेकरार रहूँ तो क्या ।
क्यों करूं मैं जुस्तजू करार की , भला ।
मिले जो सकून , दिल ए बेकरार में ।
वो , दिल ए करार में है कहाँ ।
महबूब बनके गम मेरा , रहे साथ मेरे जख्म हरा हरा ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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