न वो रातें ही रही अब , न वो ख्वाब ही ।
सजाकर रखे थे जो कभी , हमने तेरे लिए ।
लूटी लूटी सी रह गयी है ,
जिंदगी आज , तेरे जाने के बाद ।
इल्म था न कभी के , इश्क में हुश्न ।
दगा बाज़ भी , होते है ।
मारे जो आहिस्ता आहिस्ता आशिक को ,
ये वो अंगूठी ए नगीना ए जहर होते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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