अजीव है ना , जो रिश्ते कभी बने ही नही ।
मन उसी रिश्ते को , न जाने क्यों याद करता है ।
मालूम नही क्या है , दिल की ख्वाईश
दिल ही जाने ।
मगर इन आंखों की चाहत में , उसका दीदार और बाकी है ।
बाकी है अभी , लवों का मिलना ।
उनकी आगोश में मेरा मिलना , अभी और बाकी है ।
हाँ हुई थी चंद मुलाकात , धड़कनों के शोर में ।
हुई क्या बात , दिल ही जाने ।
अभी तो उनकी मेरी , मुलाकात और बाकी है ।
अजीव है ना , जो रिश्ते कभी बने ही नही ।
मन उसी को न जाने क्यों , याद करता है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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