मुझसे पूछता है , जो कोई यह आजकल ।
कैसे हो , क्या हो रहा है जी ,आजकल ?
तो मेरा जबाब उनके , लिए रहता है यही ।
हाँ जी सब ठीक है , कुछ नही हो रहा है ।
बस दिन , पूरे हो रहे है बैठ बैठ कर ।
अक्ल भी न जाने , कहाँ चली गयी ।
वो भी काम नही , कर रही है अब ।
आगे का रास्ता , कुछ सूझ नही रहा है अब ।
चलते जा रहे है , कदम दो कदम ।
हर दिन न जाने , कहाँ ले कर जाएंगे ये कदम ।
अनजान सी डगर , न जाने कौन सी मंज़िल ।
कब मिले सकुन का सफर , इन्जार है हर नज़र ।
भटकती मृग की तृष्णा , न जाने बुझे कब ।
मन की पिपासा शांत हो , न जाने कब ।
बस बैठे है , एक टकटकी सी देख रहे ।
कभी मायूस से है , कभी हँस रहे है बे मन ।
बस हर दिन रात , चलता ही जा रहा है यह क्रम ।
न जाने कब ,कब थमेगा यह बवंडर ।
यह महाप्रलयकारी , ब्याधि भयंकर ।
भय की छवां में जी रहे है हर निरंतर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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