समझ में कुछु नहि आता रे , भगवन !
ये का , तेरी लीला है ।
सुना तो नही था , पहले मुख से तेरे ।
न कभी तूने हमको , इस बात का भान कराया ।
के प्रलय का भी यह , कोई स्वरूप होगा ।
यह कैसा है प्रलय भयंकर , अब कब तू ।
मच्छली वाली , नाव बनेगा ।
अब के “सप्तर्षि“ को बचाने हेतु भगवन ! कौन मनु , अब पैदा होगा ।
काल बना विज्ञान आज , धूमिल हुई है ज्ञान की पाटी ।
बचने की कोई राह न सूझे , काल बना आज ।
मानव का , मानव की ही जाति ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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