अच्छा आ गईं है क्या पलकों पर निंदिया , या दूर है कुछ अभी ।
तो कहें कुछ जरा सा , ठहर जाओ तो ।
हूई नही है जी भर के , मुलाकात अभी ।
हो जाएगी दिल से दिल की बात , जो कर सको तो ।
ठहरो तो ! जो न आई हो , पलकों पे वो शबनमी सी बरसात ।
कुछ ढूंढ ले हम भी इन आँखों में , खुद की खातिर ।
बस इक तेरी इज़ाजत की है , बात जो दे सको तो ।
इश्क भी नही है हमें तुमसे ,
मगर जी भी तो , तेरे बिन नही लगता ।
एक अनबुझी सी प्यास है , इस दिल की ।
बुझ जाएगी ये प्यास , जो तुम चाहो तो ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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