मेरी ख़ामोशी पर न जाना तुम ।
हर ठोकरों का हिसाब ,
हमने दफन , अपनी जुबाँ पर रखा है ।
खुल जाए जो तो ,
सैलाब आ जाएगा , कयामत का ।
हमने हर कयामत को अभी तक ,
सीने में दबाए रखा है ।
उम्र ढल गयी तो क्या ?
उम्र ढल गयी तो क्या , साखिये !
हुश्न का प्याला पी जाए अब भी ,
आशिकी मेरी ।
हुनर इश्क का हमने ,
अब भी अपना , सलामत रखा है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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