आच्छादित है नभ श्याम पट से , चंद्र झांके लुक छुप ।
कभी व्योम के बाहर , कभी अंदर ।
दिशाओं में अंधकार गहन , एक तारा आशाओं का ध्रुव ।
उत्तर का भान , रमणीय सुंदर ।
इक टक टकी सी लगी , धुंधला सा हुआ आंखों में कुछ ।
कब भोर हुई होश नही , खोया रहा न जाने कहाँ मेरा अंतर्मन ।
तेज दिनकर की तपिस , पड़ी जब मेरे चर्म पर ।
आभास हुआ भोर होने का तब , जगा कुछ हल्का सा मेरा मन ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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