इलज़ाम ए हुस्न , ये वादा खिलाफी का ।
इशारों ही इशारों में वो , हम पर ही लगा गए ।
अच्छा आ जाओ , करे कोई वादा फिर एक बार ।
देखते है के तुम निभाते हो , के हम ।
हो जाएगा फैसला के , वादों से मुकर जाना ।
तुम ! हमें सिखाते हो कि , तुम्हें हम ।
आसाँ नही , निभा पाए हर कोई
वादा ए मोहब्बत ।
ये वो इम्तिहान है जिसमें , खुद को झुकाना पड़ता है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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