गिरा दो अब चिलमन इन , नज़रों पर ।
आ अब कुछ देर , इन्हें भी आराम दें ।
सफर बहुत बचा है अभी , तय करना ।
बहुत कुछ है लिखना , और पढ़ना ।
बहुत नाजुक है फिर भी , साहस की दाद देता हूँ ।
टकटकी से लगी रहती है , देखती जाती है ।
ओझल में भी , फाड़ फाड़कर ।
चलो सो जाएँ अब ,
गिरा दो चिलमन , इन नज़रो पर ।
✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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